May 19, 2024 9:11 am
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जीभ में अमृत भी है और विष भी

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*🔥🌷👏🏻जय श्री राम 👏🏻🌷🔥*
*जीभ में अमृत भी है और विष भी*
भगवान ने कान दो दिये हैं और जीभ एक। इसका अर्थ है- हम सुनें अधिक बोलें कम। भावार्थ यह है कि चिन्तन, मनन, स्वाध्याय और सत्सङ्ग के आधार पर सद्भावनाओं का समुचित संग्रह अपने भीतर जमा करें और उसमें से सार रूप में सर्वोत्कृष्ट प्रतीत हो, उसी को जिह्वा पर आने दें। जीभ में अमृत भी है और विष भी। विषपान करने वाले मुंँह के रास्ते ही उसे भीतर ले जाते हैं।दुर्भावग्रस्त संस्कार सहित वाणी को विष ही कहा गया है। वह प्रथम अनर्थ वक्ता का ही करती है। उसकी गरिमा का हनन करती है और दूसरों की दृष्टि में उसका मान गिरा देती है। किन्तु यदि अमृत वचन बोले जायें, तो उसमें वक्ता को अपने आप में उल्लास का उभार दीखता है और समीपवर्ती लोग उसका रसास्वादन करते तृप्त होते हैं। विवेक, तथ्य, दूरदृष्टि एवं सदुद्देश्य के सम्मिश्रण के साथ किए गए शब्दोच्चार को सरस्वती कहा गया है। जिह्वा पर सरस्वती के आवर्तन का अलंकार यह संकेत करता है, कि सज्जनता का बहुत कुछ परिचय उनकी मधुमयी वाणी से प्राप्त होता है।कामकाजी बातों के अतिरिक्त जहांँ भावोत्तेजक एवं विचार परिष्कार की दृष्टि से जो भी वार्तालाप किया जाता है, वह वस्तुतः जप का ही एक प्रकार है। जप का उद्देश्य है- अमुक शब्दावली को बार-बार कहते रहने के फलस्वरुप मंत्र में सन्निहित विचारधारा को हृदयंगम करना, परिपक्व बनाना।धर्म ग्रंथों का पाठ, भक्ति गीतों का गायन इसी दृष्टि से किया जाता है। यह प्रयोजन समय-समय पर विचार विनिमय अथवा परामर्शपरक आदान प्रदान से भी सम्भव हो सकता है।अपने और दूसरों की भावनाओं को उभारने वाला,सत्प्रवृत्तियों को विकसित करने वाला शब्दोच्चार करने वाला व्यक्ति मौन साधन एवं जप उपासना का फल प्राप्त करता है। ऐसे अभिवचन उच्चारणकर्ता का भी कल्याण करते हैं, लोकमङ्गल का प्रयोजन भी उनसे बड़ी मात्रा में पूरा होता है।सन्त विनोबा ने पुंढरपुर सर्वोदय सम्मेलन में एक प्रवचन में वाणी की उपासना पर प्रकाश डालते हुए कहा था- “मेरा बोलना जप के लिए है, प्रचार के लिए नहीं। जिन विचारों को बोलता हूंँ, वे दृढ़ होते चले जाते हैं। जो किया है, आप लोगों ने किया, मैंने तो जप किया है। भूदान का जप किया तो सम्पत्ति दान मिला। न तो मैं यज्ञ करता हूंँ, न दान करता हूंँ, न तप करता हूंँ, मैं तो केवल जप ही करता हूंँ, और जप से मेरे सारे काम बन जाते हैं।”यह रचना मेरी नहीं है मगर मुझे अच्छी लगी तो आपके साथ शेयर करने का मन हुआ।🙏🏻

गिरीश
Author: गिरीश

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