May 23, 2024 3:40 am
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*🚩🌺मन की सीमा जहां खत्म होती है वहां से शुरू होती है आध्यात्मिक साधना*

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*🚩🌺मन की सीमा जहां खत्म होती है वहां से शुरू होती है आध्यात्मिक साधना*
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*🚩🌺यह संसार पांच भौतिक तत्वों से बना है। इनमें आकाश तत्व सबसे सूक्ष्म है। अत्यंत सूक्ष्मता के कारण आकाश तत्व का अस्तित्व सिर्फ ध्वनि के माध्यम से सिद्ध होता है। इस आकाश तत्व या इसके ध्वनि तरंगों को समझने के लिए एक विशेष किस्म के वैज्ञानिक यंत्र की आवश्यकता होती है। आकाश तत्व को छोड़कर बाकी चार तत्वों को हम अपनी इंद्रियों की सहायता से आसानी से समझ सकते हैं। ईश्वर इन पांच तत्वों से भी सूक्ष्म हैं।*

*🚩🌺ईश्वर मानसिक या अति मानसिक  दायरे से भी परे हैं। ये पंचतत्व मात्र इनके आभास हैं। इसलिए अपने मन की सहायता से ईश्वर या भूमा चेतना  तक पहुंचना असंभव है। इसलिए मन को बार-बार निराश होकर लौटना पड़ता है, क्योंकि वह मनुष्य की कल्पना शक्ति की पहुंच से परे हैं। यानी साधारण ज्ञान के जरिए ईश्वर को प्राप्त नहीं किया जा सकता।*

*🚩🌺ईश्वरीय आनंद में प्रतिष्ठित होने पर मन, बुद्धि, शब्द सभी लुप्त हो जाते हैं क्योंकि वह स्वयं आनंद हैं, निरपेक्ष आनंद। स्वयं की चेतना के आनंद की शक्ति के जरिए उनमें प्रतिष्ठित होना पड़ता है। वहां पहुंचने पर मन अस्तित्वहीन हो जाता है। इसलिए इन छह बंधनों- काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य से भी मुक्ति मिल जाती है।*

*🚩🌺इसीलिए ईश्वर जो हमारे लक्ष्य हैं, वह आंखों के जरिए नहीं देखे जा सकते। अपनी इंद्रियों के माध्यम से इस सूक्ष्मतर सत्ता को नहीं समझा जा सकता। अणुकण  और अणुओं  से भी अति सूक्ष्म होने के कारण इंद्रियां उन्हें पकड़ पाने में असमर्थ हैं।पदार्थ के कणों को देखने के लिए वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता लेनी पड़ती है। ईश्वर को इन साधनों से नहीं देखा जा सकता। फिर भी ईश्वर साधकों के लिए अदृश्य नहीं हैं। उन्हें देखने के लिए तपस्या करनी पड़ती है। जिस प्रकार atom और molecules को देखने के लिए बौद्धिक और वैज्ञानिक दृष्टि की जरूरत होती है, उसी प्रकार ईश्वर को देखने के लिए आध्यात्मिक दृष्टि की जरूरत होती है। यानी ईश्वर केवल आध्यात्मिक ज्ञान के माध्यम से ही प्राप्त हो सकते हैं।*

*🚩🌺जब कोई आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, उसके सभी दुख और चिंताएं दूर हो जाती हैं। क्यों? क्योंकि मन ही सुख और दुख का कारण है, पर ईश्वर अतिमानस स्तर के भी परे हैं। वे पुरातन हैं क्योंकि उनका जन्म काल से परे हैं। आध्यात्मिकता में स्वयं प्रतिष्ठित होने के कारण वह किसी दूसरे पथ पर निर्भर नहीं हैं। उस ईश्वर को प्राप्त करने के लिए जो आध्यात्मिकता का परमलक्ष्य है, वह है साधना का पथ। यानी अपने अंदर अपनी स्वयं की प्रेरणा के बल पर आगे बढ़ना।*

*🚩🌺अध्यात्म के पथ पर समर्पित होकर जो व्यक्ति साधना की राह पकड़ता है, वह ईश्वर को प्राप्त करने में सफल हो सकता है। ईश्वर प्राप्ति के बाद वह सुख और दुख से परे चला जाता है। फिर सुख-दुख की मानसिक विकृति उसमें नहीं रह जाती है। इसी अवस्था को आनंद की अवस्था कहते हैं। निष्कर्ष यह है कि मन और बुद्धि की सीमाओं के कारण हम ईश्वर को नहीं समझ सकते। इसके लिए आध्यात्मिक दृष्टि की आवश्यकता है।*

*🚩🌺यह आध्यात्मिक दृष्टि तपस्या और साधना से प्राप्त होती है। आध्यात्मिक ज्ञान से व्यक्ति क्षणिक और शाश्वत के बीच अंतर समझ पाता है और ईश्वर की प्राप्ति के माध्यम से परम आनंद को प्राप्त करता है।*

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गिरीश
Author: गिरीश

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