May 23, 2024 3:54 am
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‼️संकट मोचन श्री हनुमान जी!!!!

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‼️संकट मोचन श्री हनुमान जी!!!!

हनुमान जी भगवान शिव के 11वें अंशावतार थे जो श्रीराम की सहायता करने के लिए इस धरती पर आये थे। उन्होंने श्रीराम से मिलन के पश्चात जीवनभर उनके हरेक कष्ट को दूर करने में उनकी सहायता की। उनके निश्छल सेवाभाव के कारण ही उन्हें श्रीराम का परम भक्त कहा जाता है।
भाव: ईश्वर का सच्चा भक्त वह होता है जो धन, संपत्ति, वैभव, सम्मान इत्यादि की लालसा किये बिना केवल ईश्वर के सानिध्य में रहने के लिए उनकी सेवा करता है।

हनुमान जी प्रतिदिन योग व ध्यान भी करते थे। हम भी उनसे प्रेरणा लेकर प्रतिदिन व्यायाम, योग व ध्यान करते हैं तो फिर हमारा शरीर रोगमुक्त हो जाता है और हम शारीरिक व मानसिक रूप से स्वस्थ बनते हैं। यदि हम हनुमान जी के चरित्र को अपने मन में उतारते हैं और उनका ध्यान करते हैं तो इससे हमारे अंदर के सभी दोष, अवगुण, नकारात्मक भावनाएं इत्यादि स्वतः ही दूर हो जाती है।

हनुमान जी का जन्म माँ अंजनी के गर्भ से हुआ था जो सूर्य देव का आशीर्वाद था। उनके अंदर असीम शक्तियां थी जिसका सामना करने का साहस शायद ही कोई जुटा सकता हो। ऐसे में हनुमान जी अपने को मिली इन असीम शक्तियों का उपयोग या दुरुपयोग करने के लिए स्वतंत्र थे लेकिन उन्होंने सदैव अच्छे व संत लोगों की रक्षा करने और अनुचित कार्य करने वालों को दंड देने के लिए ही इसका उपयोग किया।
भाव: यदि हमारे पास शक्ति है तो हमें उसका अच्छे कार्य में सदुपयोग करना चाहिए।

सीता माता की खोज के लिए भारतवर्ष के चारों दिशाओं में ही विशाल सेनाओं के समूह भेजे गए थे जिसमें से हनुमान ने ही अपनी बुद्धिमता व शक्ति का परिचय दिया। रावण की नगरी लंका में अकेले जाने के लिए साहस व बुद्धि दोनों की आवश्यकता थी,हनुमान जी ने यह कार्य बखूबी निभाया। उन्होंने ना केवल लंका में प्रवेश किया बल्कि माता सीता को आश्वस्त कर रावण को चेताने का भी कार्य किया।
भाव:हमें शक्ति के साथ-साथ साहस व बुद्धि का होना भी जरुरी है।

समुंद्र बहुत ही विशाल था और उसे पार करना बहुत मुश्किल और थका देने वाला था। हनुमान जी चाहते तो बीच-बीच में विश्राम कर आगे बढ़ सकते थे लेकिन उनके मन में स्वयं के विश्राम से पहले अपने प्रभु की पीड़ा थी जिसने उन्हें थकने नहीं दिया। बीच में उन्हें विश्राम करने का अवसर भी मिला लेकिन उन्होंने इसे सहर्ष ठुकरा दिया।
भाव: यदि हमारा मन ईश्वरीय भक्ति में है तो इससे हमारी थकान भी स्वतः ही दूर हो जाती है और हमें निरंतर कार्य करते रहने की प्रेरणा मिलती है।

हनुमान जी के द्वारा लंका को जलाना कोई साधारण या बिना सोचे-समझे किया गया कार्य नहीं था। हनुमान जी चाहें तो अपनी पूँछ में आग लगाये जाने के बाद सीधा उसे बुझाकर वापस लौट सकते थे, फिर उन्होंने लंका में आग क्यों लगायी? दरअसल उन्होंने पहले ही भांप लिया था कि श्रीराम की सेना को यहाँ तक पहुँचने में अभी समय लगेगा, ऐसे में लंका में आग लगाकर रावण को उसे पुनः व्यवस्थित करने में व्यस्त कर दिया जाए तो प्रभु के कार्य सरल हो जाएंगे। साथ ही रावण की सेना का साहस भी डगमगाएगा क्योंकि उन्हें लगेगा कि जब श्रीराम का भेजा गया एक दूत इतना शक्तिशाली है तो पूरी सेना कितनी अधिक शक्तिशाली होगी। जो राक्षसी माता सीता को दिन रात पीड़ा पहुंचा रही थी, वे युद्ध में श्रीराम के विजयी होने का सोचकर उन्हें कम पीड़ा पहुंचाएगी।
भाव:भविष्य में उत्पन्न होने वाली संभावनाओं को देखकर निर्णय लेने की आदत डालें।

लक्ष्मण के पास केवल सूर्योदय तक का ही समय था और उससे पहले उन्हें संजीवनी बूटी नहीं मिलती तो उनके प्राण निकल जाते। ऐसे में एक रात में ही भारत के दक्षिणी छोर से उत्तरी छोर तक जाकर और फिर वहां से संजीवनी बूटी लाने का कार्य असंभव सा प्रतीत हो रहा था। उस असंभव दिखने वाले कार्य को भी हनुमान जी ने अपनी कुशलता से संभव कर दिखाया।
भाव;हमारे जीवन में भी बहुत से ऐसे कार्य आते हैं जो हमें असंभव से दिखते हैं लेकिन हमें उनसे डरने या दूर हटने के अलावा उन्हें किस तरह से किया जाना चाहिए, इस ओर ध्यान देना चाहिए। इस तरह की सोच रखने और निरंतर प्रयास करते रहने से हमें भी उस कार्य में सफलता मिलती है।

पृथ्वी लोक पर रावण की राक्षसी सेना से लड़ना अलग बात है लेकिन पाताल लोक तो है ही राक्षसी नगरी। ऐसे में वहां जाना और फिर अहिरावण के यज्ञ को विफल कर देना भी बहुत चुनौतीपूर्ण था। पांच दिशाओं में रखी अग्नि को एक साथ बुझाना भी असंभव सा ही कार्य था लेकिन हनुमान जी ने उसे भी अपनी बुद्धि से कर दिखाया। भाव;असंभव कार्य कई तरह के होते हैं जिसमें से कोई कठिन परिश्रम मांगता है तो कोई तीव्र बुद्धि। ऐसे में उस कार्य के लिए किस चीज़ की कितनी जरुरत है, उस पर भी सोच-विचार कर लेना चाहिए।

यदि आपने हनुमान जी का चित्र या मूर्तियाँ देखी होंगी तो आपने अवश्य ही यह देखा होगा कि उनके एक हाथ में गदा होती है तो दूसरा हाथ भक्तों को वर मुद्रा देने में होता है। वे अपने गदा से दुष्ट लोगों को मार गिराते हैं तो वहीं दूसरे हाथ से अपने भक्तों को अभय प्रदान करते हैं।
भाव;हमें भी केवल एक ही जगह पर ध्यान नहीं लगाना चाहिए, हमारा उद्देश्य बुरे लोगों को सही मार्ग दिखाना तो होना ही चाहिए और उसी के साथ-साथ अच्छे लोगों की भलाई का काम भी होना चाहिए।

🚩🙏जय श्री राम 🙏🚩
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गिरीश
Author: गिरीश

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